भारत में राष्ट्रवाद | pdf, सविनय अवज्ञा आंदोलन, प्रथम विश्व, आदि

भारत में राष्ट्रवाद भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद की वृद्धि औपनिवेशिक आंदोलन से जुड़ी हुई है। उपनिवेशवाद के साथ अपने संघर्ष की प्रक्रिया में लोगों ने एकता की खोज शुरू कर दी।

औपनिवेशिक शक्ति के तहत उत्पीड़न की भावना विभिन्न वर्गों के लिए सामान्य थी, लेकिन प्रत्येक वर्ग और समूह ने उपनिवेशवाद का प्रभाव अलग-अलग महसूस किया। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इन समूहों को एक आंदोलन के अंतर्गत एकजुट करने की कोशिश की।

प्रथम विश्व युद्ध, खिलाफत और असहयोग आंदोलन

भारत में राष्ट्रवाद

प्रथम विश्व युद्ध (1914) ने दुनियाभर में एक नई आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का निर्माण किया। करों में बढ़ोतरी, अनाज की बढ़ती कीमतें, अधिक किराया आदि से आम लोगों को अत्यधिक कठिनाई हुई। सेना में लोगों को बलपूर्वक भर्ती किया जा रहा था, जिसके कारण लोगों में व्यापक क्रोध था।

युद्ध के बाद भारतीय उद्योगों को अत्यधिक हानि हुई। लोगों को भोजन की कमी, इन्फ्लूएंजा महामारी (Influenza Epidemic) आदि का सामना करना पड़ा। इस प्रकार की कठिन परिस्थितियों में एक नए नेता मोहनदास करमचंद गाँधी अपने सत्याग्रह के दर्शन के साथ जनवरी, 1915 में भारत आए।

सत्याग्रह और इसके अमल का विचार

  • दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के लिए गाँधीजी की वीरता की लड़ाई से सभी परिचित थे। सत्य और अहिंसा के आधार पर आंदोलन और विरोध का उनका अमल का तरीका सत्याग्रह के रूप में जाना जाता था।
  • आक्रामक हुए बिना एक सत्याग्रही अहिंसा के माध्यम से युद्ध जीत सकता है। वर्ष 1916 में गाँधीजी बिहार के चंपारण में गए और किसानों को दमनकारी बागान व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रोत्साहित किया।
  • वर्ष 1916 में गाँधीजी ने गुजरात के खेड़ा जिले में किसानों का समर्थन किया था, जो फसल की असफलता के कारण भोजन की कमी से पीड़ित थे
  • सलाह दी कि जब तक उनकी छूट की माँग स्वीकार न की जाए, तब तक वे राजस्व का भुगतान न करें। वर्ष 1918 में गाँधीजी सूती कपड़ा कारखानों के श्रमिकों के बीच सत्याग्रही आंदोलन को व्यवस्थित करने का लिए अहमदाबाद गए।

खिलाफत आंदोलन क्या हैं

  • रॉलेट सत्याग्रह के दौरान महात्मा गाँधी ने महसूस किया कि भारत में अधिक व्यापक आंदोलन शुरू करने की आवश्यकता है, लेकिन उनका यह विचार था कि हिंदुओं और मुस्लिमों को एक साथ मिलाए बिना किसी भी आंदोलन का आयोजन नहीं किया जा सकता।
  • ऐसा करने का एक तरीका है कि वे खिलाफत का मुद्दा उठाएँ। प्रथम विश्व युद्ध ओटोमन तुर्की की हार के साथ समाप्त हो गया था।
  • यह अफवाह फैल रही थी कि इस्लामिक विश्व के आध्यात्मिक नेता (खलीफा) ओटोमन सम्राट पर एक कठोर शांति संधि लगाई जाएगी।
  • भारत के मुसलमानों ने ब्रिटेन को अपनी तुर्की नीति को बदलने के लिए मजबूर करने का फैसला किया। मौलाना आजाद, हकीम अजमल खान और हसरत मोहानी के नेतृत्व में एक खिलाफत समिति की स्थापना हुई थी।
  • मुस्लिम नेता मोहम्मद अली और शौकत अली ने इस मुद्दे पर एकजुट सामूहिक कार्रवाई की संभावना के बारे में महात्मा गाँधी के साथ चर्चा शुरू की।
  • गाँधीजी ने इसे ‘हिंदुओं और मुसलमानों को एकजुट करने का एक अवसर’ कहा। कांग्रेस ने सितंबर, 1920 में अपने कलकत्ता सत्र में खिलाफत मुद्दे पर सत्याग्रह शुरू करने के लिए प्रस्ताव पारित किया। इसके अंतर्गत सफलता प्राप्त करने के लिए महात्मा गाँधी ने कुछ रणनीतियाँ तैयार की, जो इस प्रकार हैं
  • आंदोलन को लोगों द्वारा खिताब, सम्मान और मानद पदों के आत्मसमर्पण के साथ शुरू करना पड़ा। सिविल सेवा, सेना, पुलिस, ब्रिटिश न्यायालयों और विधान सभाओं, स्कूल और कॉलेजों और ब्रिटिश सामान का बहिष्कार या बहिष्कार करने की योजना है।
  • देशी सामानों को बढ़ावा देने के लिए ब्रिटिश सामानों को घरेलू सामान या स्वदेशी द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना था।
  • सरकार के दमन के मामले में, सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया जाएगा।
  • अंत में दिसंबर, 1920 में नागपुर सम्मेलन के दौरान कांग्रेस द्वारा असहयोग आंदोलन अपनाया गया। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में असहयोग-खिलाफत आंदोलन पूर्ण बल से शुरू हुआ।

आंदोलन के अंदर अलग-अलग धाराएँ

  • जनवरी, 1921 में असहयोग-खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ। विभिन्न सामाजिक समूहों ने अपनी विशिष्ट आकांक्षाओं के साथ आंदोलन मेंभाग लिया। यह आंदोलन शहर में मध्यम वर्ग की भागीदारी के साथ शुरू हुआ था।
  • छात्रों और शिक्षकों ने सरकार नियंत्रित स्कूल छोड़ दिए और वकीलों ने मुकदमे लड़ना बंद कर दिया। आर्थिक मोर्चे पर असहयोग आंदोलन का प्रभाव नाटकीय था। लोगों ने विदेशी कपड़े और माल को अस्वीकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय कपड़ा मिलों और हथकरघों का उत्पादन बढ़ गया।
  • यह आंदोलन धीरे-धीरे कम होता गया। खादी का कपड़ा महँगा होने के कारण गरीबों के लिए उपयुक्त नहीं था। वे मिलों के कपड़े का ज्यादा दिनों तक विरोध नहीं कर सकते थे।
  • ब्रिटिश संस्थानों के बहिष्कार से भी समस्या पैदा हो गई, इसलिए छात्रों और शिक्षकों को सरकारी स्कूलों में अध्ययन और नौकरी के लिए फिर से आना शुरू करना पड़ा। वकीलों ने भी सरकारी अदालतों में कार्य पुनः प्रारम्भ कर दिया था।

देहात में विद्रोह।

  • शहरों से असहयोग आंदोलन ग्रामीण क्षेत्रों में फैल गया। अवध में किसानों का नेतृत्व बाबा रामचंद्र कर रहे थे। बाबा रामचंद्र फिजी में गिरमिटिया मजदूर के रूप में काम कर चुके थे।
  • किसानों का आंदोलन अत्यधिक राजस्व वसूल करने वाले जमींदारों के विरुद्ध था। इस आंदोलन में लगान कम करने, बेगार खत्म करने और दमनकारी जमींदारों का बहिष्कार करने की माँग की गई। कई जगहों पर जमींदारों को नाई धोबी की सुविधाओं से वंचित करने के लिए पंचायतों ने नाई धोबी बंद का आदेश दिया।
  • जून, 1920 में जवाहरलाल नेहरू ने अवध के गाँवों में घूमना शुरू कर दिया। उन्होंने ग्रामीणों से बात की और उनकी समस्याओं को समझने की कोशिश की। अक्टूबर तक अवध किसान सभा (Oudh Kisan Sabha) की स्थापना की गई।
  • इसका नेतृत्व जवाहरलाल नेहरू, बाबा रामचंद्र और कुछ अन्य लोगों ने किया था। एक महीने के अंदर इस क्षेत्र के आस-पास के गाँवों में 300 से अधिक शाखाएँ स्थापित की गई थीं। इस आंदोलन के फैलने से तालुकदारों (भारतीय भूमि धारकों) और व्यापारियों के घरों पर हमला किया गया, बाजारों को लूट लिया गया और अनाज के गोदामों पर कब्जा किया गया।

आदिवासी किसानों द्वारा स्वराज की व्याख्याएँ।

  • आदिवासी किसानों ने महात्मा गाँधी के संदेश और स्वराज के विचार का अलग अर्थ निकाला। उन्होंने सोचा था कि गाँधीजी ने घोषित किया है
  • कि किसी भी कर का भुगतान नहीं किया जाएगा और गरीबों के बीच भूमि को पुनर्वितरित किया जाएगा। इसके कारण आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों में एक आतंकवादी गुरिल्ला आंदोलन, अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में पूर्ण रूप से फैल गया था।
  • असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर राजू ने महात्मा गाँधी की महानता की बात की तथा लोगों को ‘खादी’ पहनने और शराब का त्याग करने को कहा। उनका मानना था कि भारत अहिंसा से नहीं, बल्कि बल के उपयोग से मुक्त हो सकता है।
  • गुडेम के विद्रोहियों ने पुलिस स्टेशनों पर हमला किया, ब्रिटिश अधिकारियों को मारने का प्रयास किया और स्वराज को प्राप्त करने के लिए गोरिल्ला युद्ध जारी रखा। राजू को पकड़ लिया गया और वर्ष 1924 में फाँसी दे दी गई और धीरे-धीरे वे लोकनायक बन गए।

नमक यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन

  • महात्मा गाँधी ने विचार किया कि नमक एक शक्तिशाली प्रतीक था, जो राष्ट्र को एकजुट कर सकता था। उन्होंने वायसराय इरविन को एक पत्र लिखा, जिसमें ग्यारह माँगों का आग्रह किया गया था। इन माँगों में नमककर को खत्म करने की माँग भी शामिल थी।
  • नमक पर कर और इसके उत्पादन पर सरकार के एकाधिकार को गाँधीजी ने ब्रिटिश शासन का सबसे क्रूर पक्ष बताया । इरविन माँग पर बात करने के लिए तैयार नहीं थे, तो गाँधीजी ने आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन।

गाँधीजी ने 12 मार्च, 1930 को 78 अनुयायियों के साथ गुजरात के तटीय शहर दांडी के लिए साबरमती आश्रम से अपनी यात्रा शुरू की। 6 अप्रैल को वह दांडी पहुँचे और उन्होंने नमक कानून का औपचारिक रूप से उल्लंघन किया।

उन्होंने समुद्री पानी को उबालकर नमक बनाना शुरू किया। इस प्रकार सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की गई। इस आंदोलन के अंतर्गत।

  • विदेशी कपड़े का बहिष्कार किया गया। शराब की दुकानों का विरोधकिया गया था।
  • किसानों ने राजस्व और चौकीदारी कर देने से इनकार कर दिया।
  • गाँव के अधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया।
  • कई जगहों पर वनीय लोगों ने वन कानूनों का उल्लंघन किया। इस आंदोलन से परेशान होकर औपनिवेशिक सरकार ने कांग्रेसी नेताओं को एक-एक करके गिरफ्तार करना शुरू किया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन को बंद करना।

भारत में राष्ट्रवाद

इस आंदोलन को बंद करने के लिए सत्याग्रहियों पर हमला किया गया, महिलाओं और बच्चों को पीटा गया और करीब 1,00,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया। जब एक प्रमुख नेता अब्दुल गफ्फार खान को वर्ष 1930 में गिरफ्तार किया गया।

तो शहर में कई हिंसक घटनाओं की सूचना मिली। इस स्थिति में महात्मा गाँधी ने एक बार फिर आंदोलन को बंद करने का फैसला किया और 5 मार्च, 1931 को इरविन के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए।

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