आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय | Aacharya mahaveer Prasad Dwivedi ka jivan Parichay

नमस्कार साथियों आज की इस पोस्ट में हम आपको बताएंगे कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म और उनकी शिक्षा कैसे हुई आइए जानते हैं आज के इस पोस्ट में।

लेखक-एक संक्षिप्त परिचय।
आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय।


जन्म
5 मई, सन् 1864 ई०।

जन्म स्थान
दौलतपुर (रायबरेली), उ० प्र०

पिता
रामसहाय द्विवेदी

प्रारंभिक शिक्षा
घर पर संस्कृत, अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी, बांग्ला भाषाओं का स्वाध्याय

उपाधि
काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने ‘आचार्य’ की उपाधि से इन्हें सम्मानित किया

भाषा
अत्यन्त प्रभावशाली, संस्कृतमयी और साहित्यिक हिन्दी

शैली
प्रयोग, प्रमुख रूप से भावात्मक। और विचारात्मक शैली का उपयोग

प्रमुख रचनाएँ
हिन्दी-नवरत्न, मेघदूत, शिक्षा, सरस्वती,
कुमारसंभव, रघुवंश, हिन्दी महाभारत आदि

मृत्यु
21 दिसम्बर, सन् 1938 ई०

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय

महावीरप्रसाद द्विवेदी का जन्म ।

हिन्दी गद्य साहित्य के युग-विधायक महावीरप्रसाद द्विवेदी का जन्म 5 मई, सन् 1864 ई0 में रायबरेली जिले के दौलतपुर गाँव में हुआ था। कहा जाता है कि इनके पिता रामसहाय द्विवेदी को महावीर का इष्ट था, इसीलिए इन्होंने पुत्र का नाम महावीरसहाय रखा।

महावीरप्रसाद द्विवेदी शिक्षा।

इनकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की पाठशाला में हुई। पाठशाला के प्रधानाध्यापक ने भूलवश इनका नाम महावीरप्रसाद लिख दिया था। यह भूल हिन्दी साहित्य में स्थायी बन गयी। तेरह वर्ष की अवस्था में अंग्रेजी पढ़ने के लिए इन्होंने रायबरेली के जिला स्कूल प्रवेश लिया। यहाँ संस्कृत के अभाव में इनको वैकल्पिक विषय फारसी लेना पड़ा। यहाँ एक वर्ष व्यतीत करने के बाद कुछ दिनों तक उन्नाव जिले के रंजीत पुरवा स्कूल में और कुछ दिनों तक फतेहपुर में पढ़ने के पश्चात् ये पिता के पास बम्बई (मुम्बई) चले गये। वहाँ इन्होंने संस्कृत, गुजराती, मराठी और अंग्रेजी का अभ्यास किया। इनकी उत्कट ज्ञान-पिपासा कभी तृप्त न हुई, किन्तु जीविका के लिए इन्होंने रेलवे में नौकरी कर ली। रेलवे में विभिन्न पदों पर कार्य करने के बाद झाँसी में डिस्ट्रिक्ट ट्रैफिक सुपरिण्टेण्डेण्ट के कार्यालय में मुख्य लिपिक हो गये। पाँच वर्ष बाद उच्चाधिकारी से खिन्न होकर इन्होंने नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया।

महावीरप्रसाद द्विवेदी  नौकरी और मृत्यु।

इनकी साहित्य साधना का क्रम सरकारी नौकरी के नीरस वातावरण में भी चल रहा था और इस अवधि में इनके संस्कृत ग्रन्थों के कई अनुवाद और कुछ आलोचनाएँ प्रकाश में आ चुकी थीं। सन् 1903 ई० में द्विवेदीजी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका का सम्पादन स्वीकार किया। 1920 ई0 तक यह गुरुतर दायित्व इन्होंने निष्ठापूर्वक निभाया। ‘सरस्वती’ से अलग होने पर इनके जीवन के अन्तिम अठारह वर्ष गाँव के नीरस वातावरण में बड़ी कठिनाई से व्यतीत हुए। 21 दिसम्बर सन् 1938 ई० को रायबरेली में हिन्दी के इस यशस्वी साहित्यकार का स्वर्गवास हो गया।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की रचनाएं और निबंध

निबंध – सर्वाधिक निबंध , सरस्वती, मैं तथा अन्य पत्र-पत्रिकाओं एवं निबंध संग्रह के रूप में प्रकाशित हुए।

विविध रचनाएं

द्विवेदी जी ने भाषा अत्यंत व्याकरण सम्मत है उसमें पर्याप्त गति तथा प्रभाव है इन्होंने हिंदी के शब्द भंडार की श्री वृद्धि में आप प्रीतम सहयोग दिया इनकी भाषा में कहावत तो मुहावरों आदि का प्रयोग भी मिलता है इन्होंने अपने निबंधों में परिचयात्मक शैली आलोचनाएं आत्मक शैली तथा अन्य शैली का भी प्रयोग किया है कठिन से कठिन विषयों को बेगम रूप से प्रस्तुत करना है इनकी शैली की सबसे कुंवारी विशेषता है शब्दों के प्रयोग में इनका रूढ़िवादी नहीं कहा जाता है आवश्यकता अनुसार तत्सम शब्दों के अतिरिक्त arabi-farsi तथा अंग्रेजी शब्दों का भी इन्होंने व्यवहार किया है। इसलिए उन्नीस सौ ईस्वी से 1922 ईस्वी तक के समय को हिंदी साहित्य के इतिहास में द्विवेदी युग के नाम से जाना जाता है।

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