जल संसाधन क्या है | अर्थ,कमी की करण,स्रोत, महत्व

जल जीवन के लिए आवश्यक एवं बहुमूल्य संसाधन है। पृथ्वी का तीन-चौथाई भाग जल से घिरा हुआ है, परंतु इसमें से प्रयोग में आने योग्य जत्त का अनुपात बहुत कम है। प्रयोग में आने वाला अलमणीय जल (Fresh Water) सतही अपवाह और भौमवल (Ground Water) स्रोतों से प्राप्त होता है, जिनकालगातारः पुनर्भरण एवं नवीकरण जलीय चक्र (Hydrological Cycle) द्वारा होता रहता है।

जल संसाधन का अर्थ

जल संसाधन का अर्थसंपूर्ण सौरमंडल में पृथ्वी ही एक ऐसा यह है, जहाँ पर जल एवं जीवन पाया जाता है। पृथ्वी के भू-तल पर द्रव, ठोस एवं वाष्प के रूप में उपलब्ध जल को जल संसाधन कहते हैं। इनमें सबसे अधिक मांग करें। जल की है, जो मुख्यतः पेयजल के रूप में प्रयोग किया जाता है। पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल में से 97.5% भाग समुद्रा में खारे पानी के रूप में है। केवल 2.0% भाग हो मीठे पानी का है।

जल संसाधन का महत्व

भारत में विश्व के कुल जल संसाधनों का 4% भाग ही उपलब्ध है। प्रत्येक वर्ष यहाँ वर्षा से लगभग 4,000 घन किमी जल प्राप्त होता है, जिसका लगभग एक-तिहाई भाग वाष्पीकृत हो जाता है तथा अधिकांश भाग अर्थात् 45% भाग ढाल के अनुरूप बहकर झीलों, तालाबों एवं नदियों में चला जाता है। इस जल को धरातलीय जल अथवा सतही जल भी कहा जाता है। वर्षा के जल की कुछ मात्रा (लगभग 22%) मिट्टी में प्रवेश कर भूमिगत हो जाती है, जिसे भूमिगत जल अथवा अधोभीम जल कहते हैं। इस जल का 60% भाग सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है।

जल की स्रोत

1. महासागरीय जलमहासागर जैवमंडल का एक अभिन्न अंग है तथा यह मानव जीवन के लिए अनेक प्रकार से उपयोगी सिद्ध होता है। महासाग में विभिन्न प्रकार के नवीकरणीय एवं अनवीकरणीय संसाधन उपलब्ध हैं, जिनका उपयोग मनुष्य अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप करता है। महासागरीय जल के अंतर्गत महाद्वीपों के मध्य स्थित सागर, लघु सागर तथा खाड़ी का जल भी शामिल है।

2. स्थलीय जल

  • वर्षा जल धरातल पर जो जल वर्षा के द्वारा प्राप्त होता है, उसे वर्षा जल कहते हैं। वर्षा जल अत्यंत शुद्ध जल होता है। हिमालयी नदियों को छोड़कर अधिकांश नदियों, विशेषकर दक्षिणी भारत की नदियों में बहने वाला जल वर्षा का ही होता है। भारत की जलवायु मानसूनी होने के कारण यहाँ मुख्य रूप से वर्ष के तीन महीनों में ही वर्षा का जल प्राप्त हो पाता है। इसी के परिणामस्वरूप देश के बहुत बड़े भाग में धरातलीय जल की कमी हो जाती है।
  • नदी जल यह भारत के प्राकृतिक जल संसाधन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करता है। भारत में प्रचुर मात्रा में नदियाँ तथा उनका जल उपलब्ध है। नदियों में बाँध बनाकर जल-विद्युत का उत्पादन किया जाता है। भारत की अधिकांश जनसंख्या का रोजगार कृषि से चलता है, जिसके लिए सिंचाई हेतु नदियों से नहरें निकाली गई हैं। विभिन्न प्रकार के उद्योग; जैसे-ताप विद्युत संयंत्र, परमाणु ऊर्जा संयंत्र तथा अन्य अनेक उद्योगों हेतु भी नदियों के जल की आवश्यकता होती है। भारत में गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, ताप्ती, मांडवी, गोदावरी, कृष्णा व महानदी आदि नदियाँ आंतरिक जलमार्ग की सुविधा उपलब्ध करा रही हैं।
  • जलाशयों, तालाबों एवं झीलों का जल भूमि के ऊपर पाए जाने बाले जल संसाधनों में तालाब भी प्रमुख साधन हैं। इनमें वर्षा का जल एकत्र किया जाता है, जिससे वर्षभर सिंचाई की जाती है, साथ ही बांध बनाकर जल-विद्युत का उत्पादन किया जाता है। प्रायद्वीपीय पठारी भाग में तो तालाब ही सिंचाई के प्रमुख साधन हैं। भारत के तालाबों में से 90% दक्षिणी भारत में हैं, क्योंकि दक्षिणी भारत प्रायद्वीपीय पठार में बसा है।

जल संसाधन कमी की करण

स्वीडन के एक विशेषज्ञ फाल्कनमार्क के अनुसार, जल की कमी (Water Stress) तब होती है, जब प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिवर्ष 1,000 से 1,600 घन मी के बीच जल उपलब्ध होता है।

  • अधिकांश जल की कमी अत्यधिक प्रयोग और समाज के विभिन्न वर्गो में जल के असमान वितरण के कारण होती है।
  • अत्यधिक जनसंख्या के कारण जल की कमी होती हैं, क्योंकि घरेलूकार्यों में जल का उपयोग अत्यधिक होता है।
  • बढ़ती जनसंख्या को भोजन प्रदान करने के लिए कृषि को बड़े पैमाने पर किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप सिंचाई के लिए विशेष रूप से शुष्क मौसम में अधिक जल की आवश्यकता होती है।
  • बढ़ता औद्योगीकरण और शहरीकरण भी जल की कमी के लिए जिम्मेदार है। बहुत से उद्योग भारी मात्रा में विभिन्न कार्यों के लिए जल
  • का उपयोग करते हैं जिसमें इसके साथ ही इन्हें पनबिजली विद्युत स्टेशनों द्वारा उत्पन्न होने वाली बिजली की भी आवश्यकता होती है।

Leave a Comment

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *