कृषि क्या है | हरित क्रांति क्या है | फसले,प्रकार,सुधार, आदि

भारतीय कृषि की प्रमुख विशेषताएँ

कृषि भारत का प्राचीन व्यवसाय है। विश्व के कृषि प्रधान देशों में भारत की गणना की जाती है। भारत के कुल क्षेत्रफल के लगभग 51% भाग पर कृषि कार्य होता है। वर्ष 1950-51 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि का योगदान 52.2% था, जो वर्तमान में घटकर लगभग 16.3% हो गया है। इस कमी का कारण सकल घरेलू उत्पाद में सेवा, उद्योग आदि क्षेत्रों की भागीदारी का बढ़ना है। भारतीय कृषि की प्रमुख विशेषताएँ या आधार निम्नलिखित हैं

अधिकांश जनसंख्या का जीवन निर्वाह साधन भारत की लगभग 70% जनसंख्या कृषि द्वारा जीविका प्राप्त करती है। परोक्ष रूप से कृषि पर आधारित उद्योग, कृषि पदार्थों के परिवहन एवं व्यापार द्वारा भी बहुत-से लोगों को आजीविका मिलती है। इस प्रकार कृषि देशवासियों के जीवन निर्वाह का प्रमुख साधन है।

  • खाद्यान्न फसलों की प्रमुखता भारतीय कृषि में खाद्यान्नों की प्रधानता रहती है। कुल कृषित भूमि के 72% भाग पर खाद्यान्न फसलें एवं 28% भाग पर व्यापारिक फसलें उगाई जाती हैं।
  • कृषित भूमि का प्रतिशत अधिक देश के लगभग 50% क्षेत्रफल पर कृषि संपन्न होती है। कृषि भूमि का यह प्रतिशत विश्व के अनेक विकसित देशों तथा विकासशील देशों की तुलना में बहुत अधिक है।
  • बहुफसली कृषि अधिकांशतः देश में एक वर्ष में दो फसलें (रबी एवं खरीफ) होती हैं। कहीं-कहीं वर्ष में तीन फसलों (जायद फसल) भी प्राप्त की जाती हैं। रबी की फसलों के अंतर्गत गेहूँ, चना, जौ, सरसों, अलसी आदि, खरीफ में धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, कपास, तिल, मूँगफली आदि एवं जायद फसल में फल व सब्जियाँ आती हैं। फसलों का यह विभाजन उनके रोपने के समय से संबंधित है।

कृषि के प्रकार

1.प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि

  • भारत में प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि (Primitive Subsistence Farming) छोटे किसानों (विशेषकर आदिवासी) द्वारा अपने परिवार एवं मजदूरों की सहायता से भूमि के छोटे टुकड़े पर की जाती है। इसमें मुख्यतः आदिम उपकरणों (Primitive Tools); जैसे लकड़ी के हल, डाओ (Dao), खुदाई करने वाली छड़ी (Digging Sticks) आदि की सहायता से कृषि की जाती है।
  • इसलिए इस प्रकार की कृषि को कर्तन दहन प्रणाली (Slash and Burn) कृषि कहा जाता है। इस कृषि के अंतर्गत आदिवासी या किसान जंगल की भूमि का एक टुकड़ा जलाकर कृषि के लिए साफ कर देते हैं और इसके पश्चात् इस भाग को कुछ वर्षों के लिए खाली छोड़ देते हैं, जिससे प्रकृति मिट्टी को उपजाऊ बना देती है।

2.गहन जीविका कृषि

  • जहाँ पर जनसंख्या का भूमि पर अत्यधिक दबाव होता है। यह श्रम प्रधान (Labour Extensive) कृषि है, जहाँ अधिक उत्पादन के लिए अत्यधिक मात्रा में उर्वरकों एवं सिंचाई का प्रयोग होता है।

3.वाणिज्यिक कृषि

  • कृषि से अच्छी आय प्राप्त करने के लिए आधुनिक तकनीकों का बड़े पैमाने पर उपयोग करना वाणिज्यिक कृषि (Commercial Parming) कहलाता है। इस प्रकार की कृषि के मुख्य लक्षण आधुनिक निवेशों; जैसे-अधिक पैदावार देने वाले बीजों (High Yielding Variety. HYV), रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग से विस्तृत भूमि पर उच्च पैदावार प्राप्त करना है।
  • कृषि का वाणिज्यीकरण एक स्थान से दूसरे स्थान पर सिंचाई सुविधा और जलवायु आदि के आधार पर भिन्न होता है। उदाहरण के लिए हरियाणा और पंजाब में चावल वाणिज्य की फसल है, परंतु ओडिशा में यह एक जीविका फसल है।

भारत में फसल ऋतु

1.रबी फसल

  • रबी फसलों को शीत ऋतु में अक्टूबर से दिसंबर के मध्य बोया जाता है और ग्रीष्म ऋतु में अप्रैल से जून के मध्य काटा जाता है। गेहूं, जौ, मटर, चना और सरसों कुछ प्रमुख रबी फसलें हैं। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड में रबी फसलों को उगाया जाता है।
  • शीत ऋतु में शीतोष्ण पश्चिमी विक्षोभों से होने वाली वर्षा इन फसलों के अधिक उत्पादन में सहायक होती है। हरित क्रांति (Green Revolution) के कारण पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ भागों में गेहूं के उत्पादन में वृद्धि हुई हैं।

2.खरीफ फसल

  • खरीफ फसल खरीफ फसलें मानसून के आगमन (मई-जुलाई) के साथ बोई जाती हैं और सितंबर-अक्टूबर में काट ली जाती है। इस ऋतु में बोई जाने वाली मुख्य फसलें चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा, तुर, मूंग, उड़द, कपास, जूट, मूंगफली और सोयाबीन है।
  • धान (Paddy) की खेती मुख्यतया पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र (कोंकण तटीय), पंजाब और हरियाणा के भागों में की जाती है। पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम के अच्छे सिंचित क्षेत्रों में धान की तीन फसले ऑस, अमन और बोरो उगाई जाती हैं।

3.जायद फसल

  • रबी और खरीफ के बीच ग्रीष्म ऋतु (मार्च-जून) में बोई जाने वाली फसल को जायद कहा जाता है। इस ऋतु की मुख्य फसलें खीरा, खरबूजा, तरबूज, सब्जियाँ और चारा है। गन्ना एक वर्ष में तैयार होने वाली फसल है।

भारत की मुख्य फसले

अनाज और दलहन फसलें

1.चावल

  • भारत के अधिकांश लोगों का खाद्यान्न चावल है। चावल खरीफ कीफसल हैं, जिसे उगाने के लिए उच्च तापमान तथा अधिक आर्द्रता की आवश्यकता होती है।
  • इसे अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में उगाया जाता है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों; जैसे- पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान के कुछ भागों में इसे नहरों और कुओं द्वारा सिंचाई करके उगाया जाता है।

2.गेहूँ

  • गेहूँ (Wheat) भारत की दूसरी सबसे महत्त्वपूर्ण खाद्य फसल है। गेहूँ को उगाने के समय शीत ऋतु तथा पकने के समय धूप एवं समान रूप से वितरित 50-75 सेमी वर्षा की आवश्यकता होती है।
  • उत्तर-पश्चिम में गंगा- सतलुज का मैदान और दक्कन का काली मिट्टी वाला प्रदेश गेहूं उगाने वाले दो मुख्य क्षेत्र है।

3.मोटे अनाज

  • ज्वार, बाजरा और रागी भारत में उगाए जाने वाले मुख्य मोटे अनाज (Millets) हैं। इनमें पोषक तत्त्वों (Nutritional Value) की मात्रा अधिक होती है।

4.ज्वार / सोरगम

  • ज्वार में प्रचुर मात्रा में पोटैशियम, फॉस्फोरस, कैल्सियम तथा सोडियम और लौह कम मात्रा में पाया जाता है। क्षेत्रफल और उत्पादन की दृष्टि से ज्वार देश की तीसरी महत्त्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है। फसल वर्षा पर निर्भर होती है। अधिकांश आर्द्र क्षेत्रों में उगाए जाने के कारण इसके लिए सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती।

हरित क्रांति क्या है

वर्ष 1958 में इंडियन सोसायटी ऑफ एग्रोनॉमी की स्थापना की गई, जिसके प्रयासों से 1960 के दशक में पारंपरिक कृषि को आधुनिक तकनीक द्वारा प्रतिस्थापित किया गया। इसके अंतर्गत कृषि में उन्नत बीजों, उर्वरकों तथा प्रौद्योगिकी का समावेश किया गया। इन प्रयासों व बदलावों के फलस्वरूप देश में पहली बार 120 के स्थान पर 170 लाख टन गेहूँ का उत्पादन हुआ। 50 लाख टन की इस अप्रत्याशित वृद्धि को अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक नॉरमन बोरलॉग ने हरित क्रांति की संज्ञा दी।

भारत में हरित क्रांति का जनक एम. एस. स्वामीनाथन को माना जाता है। इन सफलताओं के पश्चात् वर्ष 1960 से हरित क्रांति का प्रसार देश के विभिन्न भागों में होने लगा, जिसके परिणामस्वरूप देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गया। हरित क्रांति के दौरान ही वर्ष 1964-65 में सरकार ने गहन कृषि कार्यक्रम चलाया, जिसके अंतर्गत विशिष्ट फसलों के उत्पादन पर ध्यान केंद्रित किया गया। वर्ष 1966-67 मेंअकाल पड़ा, जिसका सामना करने के लिए अधिक उपज बीज कार्यक्रम चलाया गया, जिसमें बहुफसली कार्यक्रम को भी शामिल कर लिया गया।

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