संघवाद क्या हैं | अवधारणा, शासन व्यवस्था, विशेषताएं, विकेंद्रीकरण, संघीय व्यवस्था आदि

सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच सत्ता का ऊर्ध्वाधर विभाजन (Vertical Division) आधुनिक लोकतंत्रों में सत्ता साझा करने के प्रमुख रूपों में से एक है यह सामान्य रूप से संघवाद के रूप में माना जाता है। इस अध्याय में, हम भारत में संघीय व्यवस्था के सिद्धांत और व्यवहार के विषय में वर्णन करेंगे।

संघवाद की अवधारणा

संघवाद एक ऐसी शासन व्यवस्था है, जिसमें शासन की सभी शक्तियों का केंद्रीय सरकार तथा प्रांतीय (राज्य) सरकारों के बीच बँटवारा कर दिया जाता है। संघीय शासन व्यवस्था में दो स्तरों की सरकारें होती हैं

(i) प्रथम स्तर की सरकार पूरे देश के लिए होती है, जिसके अधीन राष्ट्रीय महत्त्व के विषय होते हैं, उसे संघीय सरकार

(ii) दूसरे स्तर की सरकारें को राज्य या प्रांतों की सरकार (State Government) कहते हैं, जो शासन के दैनिक कार्य को देखती है।Union Government) कहते है।

संघवाद की विशेषताएं

  • विभिन्न स्तर की सरकारें एक ही नागरिक समूह पर शासन करती हैं, परंतु कानून बनाने (Make Law), कर वसूलने (Tax Collection) एवं प्रशासनिक कार्यों (Administrative) पर दोनों का अपना-अपना अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) होता है।
  • संविधान, सरकार के प्रत्येक स्तर के अस्तित्व (Existence) और प्राधिकार (Authorisation) की गारंटी और सुरक्षा (Security) देता है।
  • संविधान में संशोधन पर मौलिक प्रावधानों (Fundamental Provisions) को केवल संघ परिवर्तित नहीं कर सकता, ऐसे परिवर्तन करने के लिए संघ एवं राज्य दोनों स्तर की सरकारों की सहमति की आवश्यकता होती है।
  • अदालतों को संविधान और विभिन्न स्तर की सरकारों के अधिकारों की व्याख्या करने का अधिकार होता है। सर्वोच्च न्यायालय विवादों को सुलझाने के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • वित्तीय स्वायत्तता (Financial Autonomy) निश्चित करने के लिए विभिन्न स्तर की सरकारों के लिए राजस्व के अलग-अलग स्रोत निर्धारित हैं।
  • संघीय शासन व्यवस्था के प्रमुख उद्देश्य देश की एकता (Unity) की सुरक्षा करना और उसे बढ़ावा देना है।
  • क्षेत्रीय विविधता का सम्मान करना चाहिए। आदर्श संघीय व्यवस्था में भरोसा और साथ रहने पर सहमति होनी चाहिए।

भारत में संघीय शासन व्यवस्था

अनेक आंदोलनों, घटनाओं और दुःखद विभाजन के पश्चात् भारत आजाद हुआ। भारतीय संविधान के पहले अनुच्छेद ने भारत को राज्यों का संघ (Union of States) घोषित किया। भारतीय संघ का गठन संघीय शासन व्यवस्था के सिद्धांत के आधार पर हुआ है।

दो स्तरीय शासन व्यवस्था

भारतीय संविधान ने मौलिक रूप से दो स्तरीय शासन व्यवस्था2) होने (Two-Tier System) का प्रावधान किया है

(i) संघ सरकार या केंद्र सरकार (ii) राज्य सरकार

त्रि-स्तरीय शासन व्यवस्था

भारत के संघीय शासन व्यवस्था में तीसरे स्तर के शासन को जोड़ा गया, जिसे पंचायत (Panchayat) या नगरपालिका (Municipality) कहते हैं। 73वें तथा 74वें संशोधन द्वारा इन्हें महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ प्राप्त हैं। भारतीय संविधान में स्पष्ट रूप से केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों को तीन भागों में बांटा गया है, जिसे हम तीन सूचियाँ भी कहते हैं-संघ या केंद्र सूची (Union List), राज्य सूची (State List) तथा समवर्ती सूची (Concurrent List), जिनका वर्णन इस प्रकार है।

  • संघ सूची (Union List) इस सूची के अन्तर्गत प्रतिरक्षा (Defence), विदेशी मामले (Foreign Affairs), बैंकिंग, संचार (Communication) और मुद्रा (Currency) जैसे राष्ट्रीय महत्त्व के विषय आते हैं। संघ सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार को होता है।
  • राज्य सूची (State List) इस सूची में पुलिस, व्यापार (Trade), वाणिज्य (Commerce), कृषि और सिंचाई (Irrigation) जैसे प्रांतीय और स्थानीय महत्त्व के विषय आते हैं। राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल राज्य सरकारों को होता है।
  • समवर्ती सूची (Concurrent List) इस सूची में शिक्षा (Education), वन (Forest), मजदूर संघ (Trade Unions), विवाह (Marriage), गोद लेना (Adoption) और उत्तराधिकार (Succession) जैसे विषय रखे गए हैं। समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को है। जब दोनों सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों में मतभेद होता है, तब केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा बनाया गया कानून ही मान्य होता है।

संघीय व्यवस्था कैसे चलती है

संघीय व्यवस्था के सफल कार्य के लिए संवैधानिक प्रावधान आवश्यक है, परंतु इतना पर्याप्त नहीं है। भारत में संघीय व्यवस्था की सफलता का श्रेय यहाँ की लोकतांत्रिक राजनीति के चरित्र को देना होगा। यही कारण है कि संघवाद की भावना, विविधता का आदर और साथ-साथ रहने की इच्छा का हमारे देश के साझा आदर्श के रूप में स्थापित होना सुनिश्चित हुआ।

भारत में विकेंद्रीकरणका

भारत एक विशाल देश है। यहाँ दो स्तर वाली शासन व्यवस्था से अच्छा शासन नहीं चल सकता। भारत के राज्य बड़े होने के साथ-साथ यह स्वयं भी आंतरिक स्तर पर विविधताओं से पूर्ण हैं। भारत में संघीय सत्ता की साझेदारी तीन स्तरों पर करने की आवश्यकता है, जिसमें तीसरे स्तर की सरकार स्थानीय स्तर की हो। जब केंद्र और राज्य सरकार से शक्तियाँ लेकर स्थानीय सरकारों को दी जाती हैं, तो इसे सत्ता का विकेंद्रीकरण (Decentralisation of Power) कहते हैं। सत्ता के विकेंद्रीकरण के पीछे यह अवधारणा है कि अनेक मुद्दों और समस्याओं को स्थानीय स्तर पर सुलझाया जा सके।

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